UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नए नियम लागू किए हैं। हालांकि विशेषज्ञ और आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि जब पहले से ही पर्याप्त कानूनी ढांचा मौजूद है, तो ये नए नियम क्यों जरूरी हैं और इनके पालन और प्रक्रिया संबंधी पहलुओं पर भी सवाल हैं।
भारत में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए कानूनी ढांचा व्यापक है। संवैधानिक स्तर पर अनुच्छेद 14, 15 और 17 सभी के लिए समानता सुनिश्चित करते हैं, जातिगत भेदभाव पर रोक लगाते हैं और अस्पृश्यता को समाप्त करते हैं। ये प्रावधान सार्वजनिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों पर लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार परिसर में भेदभाव के मामलों में विश्वविद्यालयों को निर्देश दिए हैं, जैसे शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना, मूल्यांकन और अनुशासन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और शिकायतकर्ता व आरोपी दोनों की सुरक्षा करना।
यूजीसी के नए 2026 नियम मौजूदा मानकों को अनिवार्य, एकरूप और प्रवर्तन योग्य बनाते हैं। इनमें शामिल हैं:
- समर्पित इक्विटी कमेटियां और व्यापक अधिकार
- 24/7 शिकायत तंत्र
- समयबद्ध जांच
- नियमों का सख्त पालन, जिसमें पहचान या वित्त पोषण की रोक जैसी सजा भी शामिल है
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या भेदभाव की वास्तविकता में नहीं, बल्कि नियमों के प्रवर्तन और प्रक्रिया-संबंधी स्पष्टता में है। वर्तमान नियम पहले से मौजूद कानूनी संरचनाओं के दोहराव के रूप में लगते हैं और इनके साथ उचित प्रक्रिया, अपील तंत्र और झूठी शिकायतों से सुरक्षा स्पष्ट नहीं की गई है।
कुल मिलाकर, विवाद इस बात को लेकर है कि क्या नए नियम कानून को मजबूत करते हैं या न्यायिक संतुलन को दरकिनार कर प्रशासनिक निर्णय को प्राथमिकता देते हैं। जब तक यूजीसी स्पष्ट नहीं करेगा कि मौजूदा कानूनी उपाय क्यों पर्याप्त नहीं थे और नए नियम संवैधानिक सिद्धांतों के साथ कैसे मेल खाते हैं, यह बहस जारी रहेगी।
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