पूर्व मुख्य न्यायाधीश DY चंद्रचूड़ ने जयपुर साहित्य महोत्सव में कहा कि लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रखना संविधान के तहत तेज़ ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर समय पर ट्रायल संभव नहीं है, तो जमानत को अपवाद नहीं बल्कि नियम होना चाहिए।
चंद्रचूड़ ने उमर खालिद के मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि खालिद लगभग पांच साल से जेल में हैं लेकिन उनका ट्रायल नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि जमानत देने या न देने के मामलों में अदालतें शर्तें लगा सकती हैं ताकि जमानत का दुरुपयोग न हो।
पूर्व CJI ने जोर देकर कहा कि जमानत को सजा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, और यह अधिकार धारा 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों को निर्णय लेते समय सार्वजनिक भावनाओं या पिछली टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होना चाहिए, बल्कि सबूतों के आधार पर फैसला करना चाहिए।
चंद्रचूड़ ने तीन मान्यता प्राप्त अपवाद भी याद दिलाए, जिनमें जमानत न देने का आधार बनता है:
- आरोपी अपराध दोहराने का खतरा
- देश छोड़कर भागने का डर
- सबूतों में छेड़छाड़ करने का खतरा
उन्होंने कहा, “अगर ये अपवाद लागू नहीं होते, तो आरोपी को जमानत मिलना चाहिए।”
पूर्व CJI ने यह भी बताया कि उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 21,000 जमानत याचिकाएं देखीं, जिनमें से कई पर सार्वजनिक ध्यान नहीं गया। उनका कहना था कि न्यायपालिका का काम संविधान की रक्षा करना है, न कि सार्वजनिक आक्रोश के आगे झुकना।
चंद्रचूड़ ने अंत में चेतावनी दी कि जमानत को सजा के रूप में इस्तेमाल करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय प्रणाली में भरोसे को कमजोर करता है।
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