उन्नाव हिरासत मौ*त मामला: सजा निलंबन को सेंगर की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की

उन्नाव हिरासत मौ*त मामला: सजा निलंबन को सेंगर की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को निष्कासित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता कुलदीप सिंह सेंगर की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने उन्नाव बलात्कार पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत से जुड़े मामले में सजा निलंबन की मांग की थी।

पीड़िता के पिता को 2018 में सेंगर के एक सहयोगी ने उस समय पीटा था, जब वे अपने सहकर्मियों के साथ उन्नाव में बलात्कार मामले की सुनवाई में शामिल होने गए थे। बाद में उन्हें कथित रूप से अवैध हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और पुलिस हिरासत में गंभीर चोटों के चलते उनकी मौत हो गई।

न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की पीठ ने कहा कि भले ही सेंगर अब तक 7.5 साल की सजा काट चुके हैं और मार्च 2020 के ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ उनकी अपील काफी समय से लंबित है, लेकिन सुनवाई में हुई देरी के लिए स्वयं सेंगर ही जिम्मेदार हैं।

अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई बार-बार इसलिए टलती रही क्योंकि सेंगर ने अंतरिम जमानत, उसकी अवधि बढ़ाने और सजा निलंबन से जुड़ी कई अर्जियां दाखिल कीं। पीठ ने कहा, “अदालत इस बात से अवगत है कि अपीलकर्ता ने 7.5 वर्ष का लंबा कारावास झेला है, लेकिन अपील की सुनवाई में हुई देरी का एक बड़ा कारण स्वयं अपीलकर्ता द्वारा बार-बार विभिन्न अर्जियां दायर करना रहा है।”

अदालत ने आगे कहा कि अपील का निपटारा उसके गुण-दोष के आधार पर किया जाना ही उचित होगा। सभी तथ्यों, परिस्थितियों, वैधानिक ढांचे, सजा निलंबन से जुड़े न्यायिक सिद्धांतों और अपीलकर्ता के आपराधिक पूर्ववृत्त को ध्यान में रखते हुए सजा निलंबन की अर्जी खारिज की जाती है। फैसले की विस्तृत प्रति अभी प्रतीक्षित है।

मार्च 2020 में एक अदालत ने सेंगर, उनके भाई जयदीप सिंह सेंगर और दो पुलिसकर्मियों अशोक सिंह भदौरिया और केपी सिंह सहित सात लोगों को गैर-इरादतन हत्या (धारा 304), आपराधिक साजिश (120बी), अवैध रोक (341), स्वेच्छा से चोट पहुंचाने (323) और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया था। पुलिसकर्मियों को पीड़िता के पिता के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करने और न्यायिक हिरासत में उनके साथ मारपीट करने का दोषी पाते हुए 10 साल की सजा सुनाई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि परिवार के “एकमात्र कमाने वाले सदस्य” की मौत पर कोई नरमी नहीं बरती जा सकती।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट के 23 दिसंबर के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें बलात्कार मामले में सेंगर की सजा निलंबित की गई थी। सेंगर की मार्च 2020 के फैसले के खिलाफ अपील पर 3 अप्रैल को सुनवाई होनी है।

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