अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनियों के बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका द्वारा ईरान पर सैन्य हमला किए जाने की संभावना कम है। इसके पीछे कई सैन्य, राजनीतिक और रणनीतिक कारण हैं, जिनकी वजह से वॉशिंगटन फिलहाल संयम बरत रहा है।
हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है, लेकिन अमेरिकी सेना ने युद्ध की दिशा में कोई स्पष्ट कदम नहीं उठाया है। इस समय मध्य पूर्व के पास कोई भी अमेरिकी विमानवाहक पोत तैनात नहीं है। बल्कि रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने हाल के महीनों में इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी कम ही की है।
ईरान पर हमला करने के लिए अमेरिका को क़तर, बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक या ओमान जैसे देशों की अनुमति की आवश्यकता होगी। लेकिन इनमें से कई देश सहयोग करने के इच्छुक नहीं हैं। कई खाड़ी देश पिछले साल इज़रायल के साथ हुए सीमित संघर्ष के दौरान ईरानी हमलों के प्रभाव से अभी तक उबर नहीं पाए हैं। उन्हें आशंका है कि यदि उन्होंने अमेरिकी सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति दी, तो ईरान जवाबी हमला कर सकता है। ऐसे में उन ठिकानों की रक्षा करना भी बेहद कठिन होगा।
अमेरिका लंबी दूरी से बमबारी का विकल्प चुन सकता है, जैसा कि पहले फोर्डो स्थित ईरान के भूमिगत परमाणु ठिकाने पर बी-2 बमवर्षक से किया गया था। लेकिन आबादी वाले इलाकों में या उनके आसपास भारी हथियारों का इस्तेमाल करने से बड़ी संख्या में नागरिक हताहत हो सकते हैं। इससे राजनीतिक विरोध बढ़ेगा और गंभीर नैतिक सवाल खड़े होंगे।
इज़रायल-ईरान संघर्ष के दौरान हुए नुकसान के बावजूद, ईरान के पास अब भी बड़ी सैन्य क्षमता मौजूद है। रिपोर्टों के मुताबिक, उसके पास करीब 2,000 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनमें से कई पहाड़ी इलाकों में बने अड्डों में छिपी हुई हैं।
ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि यदि अमेरिका ने हमला किया, तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों और जहाजों को निशाना बनाएगा। इससे एक व्यापक युद्ध छिड़ने का खतरा बढ़ जाएगा।
ईरान में जारी विरोध प्रदर्शन पूरे देश में फैले हुए हैं, किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। हालाँकि सैन्य और सरकारी ठिकानों की जानकारी है, लेकिन उनमें से कई घनी आबादी वाले शहरों के पास स्थित हैं। किसी भी हमले से नागरिकों को नुकसान पहुँच सकता है, जिससे वैश्विक जनमत अमेरिका के खिलाफ जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी हमला उल्टा असर भी डाल सकता है। विदेशी आक्रमण ईरान की जनता को एकजुट कर सकता है, विरोध प्रदर्शनों को कमजोर कर सकता है और अमेरिका की अतीत की भूमिका खासकर 1953 में वॉशिंगटन समर्थित तख्तापलट की यादें ताजा कर सकता है।
आंतरिक असंतोष के बावजूद, ईरान का नेतृत्व और उसकी सुरक्षा एजेंसियाँ अब भी संगठित और मजबूत हैं।
कुछ लोगों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को निशाना बनाने की भी बात की है। लेकिन किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की हत्या गंभीर कानूनी समस्याएँ खड़ी करेगी और लगभग निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई को जन्म देगी। इसके अलावा, इससे सत्ता परिवर्तन की कोई गारंटी भी नहीं होगी, क्योंकि ईरान पहले से ही संभावित उत्तराधिकारियों की तैयारी कर चुका है।
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