क्या ब*म आज़ादी ला सकते हैं? ईरान का सवाल

ईरान का सवाल!

डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक अपने सटीक इरादे साफ़ नहीं किए हैं, लेकिन विकल्प स्पष्ट हैं। अमेरिका ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगा सकता है यानी ऐसे आर्थिक दंड जो ईरान के लिए दूसरे देशों के साथ व्यापार करना और मुश्किल बना दें। ट्रंप ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य शक्ति के इस्तेमाल पर भी विचार कर रहे हैं। वजह? दिसंबर से अब तक ईरानी सुरक्षा बलों द्वारा 600 से ज़्यादा प्रदर्शनकारियों की मौत। ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी सेना “बहुत कड़े विकल्पों” पर काम कर रही है।
लेकिन असली सवाल यह है: क्या विदेशी मिसाइलों से कभी आज़ादी आ सकती है? आइए समझते हैं कि क्या हो रहा है और यह हम सबके लिए क्यों मायने रखता है।

ट्रंप ने अपने कदमों की पूरी रूपरेखा नहीं बताई है, मगर संभावनाएँ साफ़ हैं। अमेरिका पहले से मौजूद 25% टैरिफ के अलावा और कड़े प्रतिबंध लगा सकता है, जिससे ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त कर लगे। वॉशिंगटन साइबर हमले कर ईरान की कंप्यूटर प्रणालियों और संचार नेटवर्क को बाधित कर सकता है। और सबसे चरम विकल्प ईरानी सरकारी ठिकानों पर सीधे सैन्य हमले, यानी बम और मिसाइलें।

काग़ज़ पर ये विकल्प ताक़तवर लगते हैं, लेकिन इतिहास कुछ और ही सिखाता है।

ईरान दशकों से पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। लगता है कि इतने लंबे समय के आर्थिक दबाव से बदलाव आ जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तेहरान के शासक प्रतिबंधों के बीच जीना सीख चुके हैं। वे बोझ आम नागरिकों पर डाल देते हैं और लोगों को समझाते हैं कि पश्चिम ईरान को नाइंसाफ़ी से कुचलना चाहता है।

सरकार ने क्षेत्रीय स्तर पर भी मज़बूत रिश्ते बना लिए हैं, ख़ासकर इराक के साथ ऐसे व्यापार मार्ग और वित्तीय नेटवर्क विकसित किए हैं जो अमेरिकी नियंत्रण से बच निकलते हैं। ठीक वैसे ही जैसे पानी चट्टानों के बीच से रास्ता खोज लेता है ईरान ने बाधाओं के चारों ओर बहना सीख लिया है।

यहीं से ख़तरा बढ़ता है। अगर अमेरिका सैन्य हमला करता है, तो ईरान के कट्टर शासकों को फ़ायदा होगा। कैसे? उन्हें प्रदर्शनकारियों पर और सख़्ती करने का बहाना मिल जाएगा। वे जनता से कहेंगे: “देखा? हमने कहा था अमेरिका हमें तबाह करना चाहता है। यह सुधार की नहीं, विदेशी हमले की बात है!”

ईरान के शीर्ष नेता मोहम्मद बाघेर क़ालिबाफ़ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि किसी भी अमेरिकी हमले के जवाब में इज़रायल और पूरे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमले होंगे। ईरानी सरकारी मीडिया ने बड़े पैमाने पर सरकार समर्थक रैलियाँ दिखाईं, जिनमें “अमेरिका मुर्दाबाद” और “इज़रायल मुर्दाबाद” के नारे लगे।

सैन्य कार्रवाई ईरान के शासकों को वही दे देगी जिसकी उन्हें ज़रूरत है शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को विदेशी एजेंट और देशद्रोही बताने का मौका।

ईरान की सड़कों पर जान जोखिम में डालने वाले लोग कोई विदेशी जासूस नहीं हैं। वे आम ईरानी हैं ख़ासकर महिलाएँ जो बुनियादी अधिकार और सम्मान मांग रही हैं। कुर्द क्षेत्रों में दमन सबसे ज़्यादा क्रूर रहा है। ये स्थानीय आंदोलन रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी वास्तविक समस्याओं से पैदा हुए हैं, न कि किसी सीआईए साज़िश से।

अगर अमेरिकी बम गिरते हैं, तो सरकार इस कहानी को आसानी से पलट देगी। ईरान की असली आज़ादी की लड़ाई को विदेशी दख़ल बताकर बदनाम कर दिया जाएगा। इससे कई ईरानियों की नज़र में प्रदर्शनकारियों की विश्वसनीयता भी घट सकती है।

ईरानी अमेरिकी मदद को शक़ की नज़र से क्यों देखते हैं? वजह है 1953। उसी साल सीआईए ने ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक़ को हटाने में भूमिका निभाई और शाह को फिर सत्ता में बैठाया एक तानाशाह जिसने दशकों तक पश्चिम के समर्थन से लोहे की मुट्ठी से शासन किया।

यह इतिहास ईरानियों के लिए पुरानी कहानी नहीं है; यह आज भी उनकी सोच को प्रभावित करता है। जब ट्रंप यह संकेत देते हैं कि धार्मिक शासन हटते ही अपने आप लोकतंत्र आ जाएगा, तो कई ईरानियों को पिछली ग़द्दारियों की याद आ जाती है जहाँ “मदद” के नाम पर तानाशाही मिली।

यही कारण है कि ईरान के आख़िरी शाह के बेटे रज़ा पहलवी को देश के भीतर बहुत कम समर्थन मिलता है, भले ही पश्चिमी हलकों में उन्हें संभावित नेता के रूप में पेश किया जाता हो। वे उस व्यवस्था का प्रतीक हैं जिसे ईरानियों ने पहले ही ख़ारिज कर दिया था विदेशी ताक़तों और दमन से जुड़ी व्यवस्था।

पड़ोसी देशों का हाल देखिए। इराक़ में अमेरिकी दख़ल ने स्थिर लोकतंत्र नहीं बनाया अराजकता फैलाई और देश को बाहरी नियंत्रण व हथियारबंद गुटों के हवाले कर दिया। सीरिया में केंद्रीय सत्ता के टूटने से एक पूर्व अल-क़ायदा नेता सत्ता में आया, जिसे आज पश्चिमी नेता वैध मानते हैं।

ये उदाहरण एक कड़वा सच बताते हैं: पश्चिमी सैन्य हस्तक्षेप अक्सर लोकतंत्र नहीं लाता। उलटे, सबसे संगठित और हथियारबंद समूह अक्सर चरमपंथी अराजकता में सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं।

ईरान का संकट वॉशिंगटन से हल नहीं होगा। असली बदलाव ईरानियों को खुद, अपनी शर्तों पर और अपनी गति से लाना होगा। प्रदर्शनकारियों को अमेरिकी मिसाइलों की ज़रूरत नहीं है। उन्हें समय, जगह और शायद ऐसा शांत समर्थन चाहिए जो उनकी वैधता को कमज़ोर न करे।

वॉशिंगटन के लिए सबसे कठिन काम यह मानना हो सकता है कि कभी-कभी सबसे बेहतर कदम धैर्यपूर्ण निष्क्रियता होता है ईरानी नागरिक समाज का समर्थन, बिना उन्हें विदेशी कठपुतली बनाए।

आज़ादी बाहर से थोपी गई हिंसा से नहीं आती। वह भीतर से उगती है ईरानी समाज की मिट्टी में जड़ें जमाकर। इसके अलावा कोई भी रास्ता दमन की जगह अराजकता, अस्थिरता और शायद उससे भी बदतर हालात ला सकता है।

सवाल यह नहीं है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ़ कार्रवाई कर सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या उसे करनी चाहिए और क्या ऐसी कार्रवाई उन लोगों की मदद करेगी या नुकसान पहुँचाएगी, जिनके समर्थन का वह दावा करता है। इतिहास बताता है कि जवाब काफ़ी हद तक साफ़ है।

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