सुप्रीम कोर्ट ने व्हाट्सएप की पैरेंट कंपनी मेटा को उसकी प्राइवेसी और डेटा-शेयरिंग नीतियों को लेकर सख्त चेतावनी दी है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यूज़र्स के डेटा का व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अमेरिकी टेक कंपनी को चेताते हुए कहा, “आप हमारे देश की निजता से नहीं खेल सकते। हम आपको हमारे डेटा का एक भी अंक साझा करने की अनुमति नहीं देंगे।”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि मेटा भारत के कानूनों का पालन नहीं करती है, तो वह देश छोड़ने के लिए स्वतंत्र है।
यह सुनवाई व्हाट्सएप, मेटा और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा दायर कई अपीलों से जुड़ी थी, जो जनवरी 2025 के एनसीएलएटी (NCLAT) के उस आदेश को चुनौती दे रही थीं, जिसमें डेटा शेयरिंग और बाजार में प्रभुत्व को लेकर सवाल उठाए गए थे।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी सहित अन्य वकीलों ने दलीलें पेश कीं, जबकि CCI ने यूज़र डेटा के दुरुपयोग और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल पर चिंता जताई।
मुख्य न्यायाधीश ने टेक कंपनियों द्वारा “सूचित सहमति” (informed consent) के दावे पर भी सवाल उठाया और कहा कि सड़क किनारे काम करने वाले विक्रेता या ग्रामीण क्षेत्रों के आम नागरिक जटिल प्राइवेसी पॉलिसी को वास्तविक रूप से समझ ही नहीं सकते।
उन्होंने कहा, “यह शेर और मेमने के बीच का विकल्प है। या तो आप यह लिखित आश्वासन दें कि कोई डेटा साझा नहीं होगा, या फिर हम आपकी याचिका खारिज कर देंगे।”
व्हाट्सएप की ओर से कहा गया कि उसकी प्राइवेसी पॉलिसी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, जबकि मेटा ने दावा किया कि डेटा शेयरिंग केवल पैरेंट कंपनी तक सीमित है।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यूज़र व्यवहार और चैट ट्रेंड्स के आधार पर व्यावसायिक दोहन, जैसे टार्गेटेड विज्ञापन, यूज़र्स के अधिकारों का उल्लंघन है।
चिंता जताते हुए पीठ ने उदाहरण दिया कि कैसे कुछ यूज़र्स को डॉक्टर से निजी बातचीत के तुरंत बाद दवाइयों से जुड़े विज्ञापन मिलने लगे, जिससे डेटा के व्यावसायिक इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अंतरिम आदेश के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अंतिम सुनवाई तक व्हाट्सएप किसी भी यूज़र जानकारी को मेटा के साथ साझा नहीं करेगा।
सॉलिसिटर जनरल मेहता और CCI के वकीलों ने कहा कि भले ही डेटा एन्क्रिप्टेड हो, लेकिन उसका व्यावसायिक दोहन किया जा रहा है और यूज़र डेटा व मेटाडेटा की सुरक्षा के लिए डीपीडीपी (DPDP) एक्ट को लागू करना जरूरी है।
अदालत ने भारत और यूरोप के प्राइवेसी ढांचे के बीच अंतर की ओर भी इशारा किया और कहा कि साझा किए गए डेटा के व्यावसायिक इस्तेमाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले को तीन-जजों की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया है। सभी पक्षों को डेटा प्राइवेसी, व्यवहार विश्लेषण और डीपीडीपी एक्ट के अनुपालन पर विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के जरिए केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया गया है और मेटाडेटा सुरक्षा पर निर्देश मांगे गए हैं।
सुनवाई 9 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी गई, जबकि अदालत ने दोहराया कि कोई भी व्यावसायिक गतिविधि भारतीय नागरिकों के मौलिक निजता अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती।
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