प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना किसी टकराव या उकसावे के धैर्य को ही अपनी सबसे बड़ी रणनीति बनाया। आखिरकार अमेरिका के सबसे बड़े और मुखर सौदागर को झुकना पड़ा वह भी तब, जब प्रधानमंत्री मोदी ने एक शब्द तक नहीं कहा और न ही डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ या उनके नोबेल शांति पुरस्कार के सपने को सहलाया।
आखिरकार ट्रंप ने न सिर्फ भारत के खिलाफ अपना लहजा नरम किया, बल्कि टैरिफ भी घटा दिए। एक सच्चे गुजराती व्यवसायी की तरह रणनीतिक चुप्पी और सधी हुई कूटनीति के जरिए प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा किया जो सबसे ज्यादा असरदार साबित हुई। नतीजतन भारत को 18 प्रतिशत की दर से टैरिफ मिला, जो चीन और पाकिस्तान से भी कम है। इसके साथ ही रूसी तेल खरीद पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क भी हटा लिया गया।
भारत-अमेरिका संबंधों के इस पूरे घटनाक्रम ने दिखा दिया कि कैसे पीएम मोदी ने बिना किसी टकराव के धैर्य को काम करने दिया। अंततः अमेरिका का सबसे शोर मचाने वाला डीलमेकर झपक गया और पीएम मोदी को न तो एक शब्द कहना पड़ा और न ही ट्रंप के अहंकार को सहलाने की जरूरत पड़ी। अहम बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप की शर्तों पर खेलने से साफ इनकार किया।
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक से पूछिए, तो वह बताएंगे कि कैसे भारत ने कथित तौर पर एक ट्रेड डील का मौका “गंवा दिया” क्योंकि पीएम मोदी ने पिछले साल व्यक्तिगत रूप से ट्रंप को फोन नहीं किया था।
हालांकि, इस समझौते के कई पहलू अब भी स्पष्ट नहीं हैं। ट्रंप और मोदी के बयानों में अलग-अलग कथाएं सामने आई हैं। पीएम मोदी ने न तो किसी ट्रेड डील की औपचारिक घोषणा की और न ही रूसी तेल खरीद रोकने या अमेरिकी उत्पादों के 500 अरब डॉलर की खरीद जैसे दावों का जिक्र किया, जिनका ट्रंप ने अपने पोस्ट में ढिंढोरा पीटा। गौरतलब है कि 2024 में भारत को अमेरिका का निर्यात सिर्फ 41.5 अरब डॉलर था इसे 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने में वर्षों, बल्कि दशकों लग सकते हैं।
फिर भी यह साफ है कि 18 प्रतिशत टैरिफ भारतीय उत्पादों जैसे कपड़ा, रत्न और चमड़ा को फिर से प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
इस डील से सबसे ज्यादा किसे फायदा हुआ, यह तो बारीक विवरण सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन टैरिफ में कटौती महीनों तक ट्रंप और उनके सहयोगियों की सार्वजनिक बयानबाजी झेलने के बाद पीएम मोदी के लिए एक कूटनीतिक जीत जरूर है।
तो फिर असली ट्रिगर क्या था? साफ है आज भारत की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी और गतिशील है कि उसे टैरिफ धमकियों से आसानी से डराया नहीं जा सकता। ट्रंप द्वारा “डेड इकोनॉमी” कहे जाने के बावजूद तीन बड़े देश और यूरोपीय संघ भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए आगे आए। इससे भारत की एक भरोसेमंद और स्थिर साझेदार की छवि और मजबूत हुई, जबकि अमेरिका आक्रामक नजर आया।
पिछले साल ट्रंप की व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच यूके, न्यूजीलैंड और ओमान ने भारत के साथ समझौते किए। इसमें सबसे अहम रहा भारत–ईयू का ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’, जो पिछले महीने हुआ। विश्लेषकों का मानना है कि इसी ने ट्रंप पर दबाव बनाया और भारत के साथ ट्रेड टकराव में उन्हें पहले झुकने पर मजबूर किया।
लगातार होते समझौतों ने भारत को मजबूती दी और अमेरिका के साथ बातचीत में उसकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाई। ट्रंप से नाराज कई देशों के लिए भारत पसंदीदा साझेदार बन गया। इससे भारत को डेयरी और कृषि क्षेत्रों में रियायत न देने जैसे अपने रेड लाइन पर अडिग रहने का आत्मविश्वास मिला।
हालांकि सख्ती के बावजूद पीएम मोदी ने टैरिफ मुद्दे को परिपक्वता और व्यावहारिकता से संभाला। 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के बाद भी न तो पीएम मोदी और न ही विदेश मंत्री एस जयशंकर जैसे वरिष्ठ नेताओं ने ट्रंप के साथ जुबानी जंग छेड़ी।
भारत ने ट्रंप को शुरू में ही समझ लिया था। ट्रंप को उकसावा, तमाशा और सुर्खियां पसंद हैं। पीएम मोदी ने टकराव के उस रंगमंच से दूरी बनाए रखी, जिससे ट्रंप अपनी MAGA छवि गढ़ते हैं।
दरअसल, जून 17 की तनावपूर्ण बातचीत के बाद पीएम मोदी ने ट्रंप के चार फोन कॉल तक लेने से परहेज किया, जिसमें उन्होंने भारत-पाक संघर्षविराम में अपनी भूमिका से इनकार किया था और नोबेल शांति पुरस्कार की महत्वाकांक्षा पर भी बात नहीं की थी। इससे ट्रंप का अहं आहत हुआ और 50 प्रतिशत टैरिफ सामने आया।
जेफरीज की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि भारत पर भारी टैरिफ के पीछे ट्रंप की “व्यक्तिगत नाराजगी” थी।
वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान द्वारा ट्रंप को श्रेय देने की तत्परता ने वॉशिंगटन के साथ उसके रिश्ते रीसेट करने में मदद की। इस प्रक्रिया के केंद्र में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर रहे, जिन्होंने खनिज, क्रिप्टो डील और रणनीतिक लाभ के जरिए ट्रंप से संबंध बनाए।
इन सबके बीच पीएम मोदी ने लंबी रणनीति पर काम किया। भारत ने अमेरिका के साथ बैक-चैनल बातचीत जारी रखी और रिश्तों को टूटने नहीं दिया। साथ ही यह भी नहीं दिखाया कि वह घबराया हुआ है। भारत ने अपने व्यापारिक रिश्ते विविध किए और चीन व रूस के साथ संपर्क और सार्वजनिक रूप से बढ़ाया।
पिछले साल सात साल बाद पीएम मोदी शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन के लिए चीन गए और शी जिनपिंग तथा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की। मोदी, शी और पुतिन की हंसते हुए तस्वीरों ने ट्रंप को बेचैन कर दिया। “लगता है हमने भारत और रूस को गहरे, अंधेरे चीन के हाथों खो दिया,” ट्रंप ने एक पोस्ट में लिखा। कम शब्द, लेकिन गहरा असर।
दो महीने बाद दिसंबर में पीएम मोदी ने पुतिन की भव्य राजकीय यात्रा की मेजबानी की और कई समझौतों की घोषणा हुई। यह संकेतों से भरा कदम था, जिसने दिखाया कि भारत सभी बड़ी शक्तियों से संतुलन बनाकर चल रहा है और यही रणनीति कारगर साबित हुई।
यह नहीं कि भारत ने कोई जवाबी कदम नहीं उठाया। अमेरिका के साथ व्यापार में डॉलर निर्भरता घटाने के अलावा भारत ने चुपचाप अमेरिकी दालों पर 30 प्रतिशत टैरिफ भी लगाया। यहां चुप्पी का मतलब निष्क्रियता नहीं, बल्कि अनावश्यक शोर से बचना था। जोर-शोर से की गई घोषणा ट्रंप को और भड़का सकती थी और विवाद लंबा खिंच सकता था।
ट्रंप के शोरगुल के बीच पीएम मोदी की शांत और सधी प्रतिक्रिया शायद सबसे शक्तिशाली आवाज साबित हुई जिसका नतीजा यह रहा कि टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत पर आ गए।
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