Vultures क्यों हैं ज़रूरी? BNHS ने असम के एक स्कूल में जागरूकता सत्र आयोजित किया

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भारत की सबसे पुरानी वन्यजीव संरक्षण संस्थाओं में से एक, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने हाल ही में असम में स्कूली बच्चों को संकटग्रस्त गिद्धों के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता के बारे में जागरूक करने के लिए एक विशेष सत्र आयोजित किया।

यह इंटरएक्टिव कार्यक्रम 28 जनवरी को असम के बिस्वनाथ ज़िले के एक स्कूल में आयोजित किया गया, जिसका नेतृत्व BNHS के जीवविज्ञानी गीतार्थ बोरा ने किया। सत्र में 91 छात्र और पाँच शिक्षक शामिल हुए। इसमें गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व और मानव गतिविधियों के कारण उनकी संख्या में आई गिरावट पर चर्चा की गई।

दृश्यों और सरल भाषा के माध्यम से BNHS की टीम ने समझाया कि गिद्ध किस तरह मृत पशुओं के अवशेष साफ़ करके प्रकृति में अहम भूमिका निभाते हैं और बीमारियों के फैलाव को रोकते हैं। छात्रों को यह भी बताया गया कि कुछ पशु-चिकित्सा दवाएँ इन पक्षियों के लिए कितनी घातक साबित हो रही हैं।

प्रस्तुति के दौरान गीतार्थ बोरा ने बताया कि डाइक्लोफेनाक जैसी नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएँ (NSAIDs), जो आमतौर पर मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल होती हैं, गिद्धों के लिए जानलेवा हो सकती हैं जब वे ऐसे पशुओं के शव खाते हैं। सत्र के दौरान छात्रों को सवाल पूछने और अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिससे कक्षा एक सक्रिय चर्चा मंच में बदल गई।

बोरा ने कहा, “कई बार छात्र हमें गिद्ध दिखने की जानकारी भी देते हैं। इन कार्यक्रमों के ज़रिए जागरूकता बढ़ी है और हानिकारक दवाओं के इस्तेमाल में भी कमी देखी जा रही है।”

BNHS पिछले एक साल से असम भर के स्कूलों में गिद्ध संरक्षण को लेकर जागरूकता फैला रहा है। इस दौरान संस्था ने राज्य के 160 स्कूलों तक पहुँच बनाकर छात्रों और शिक्षकों के साथ काम किया है, ताकि वन्यजीव संरक्षण के प्रति संवेदनशील और जागरूक भावी पीढ़ी तैयार की जा सके।

शिक्षा के साथ-साथ BNHS देशभर में ज़मीनी स्तर पर संरक्षण कार्यों में भी सक्रिय है। संस्था चार गिद्ध प्रजनन केंद्र और कई रिलीज़ केंद्र संचालित करती है, जहाँ लगभग 700 गिद्ध रखे गए हैं। हर साल कैप्टिव-ब्रीड गिद्धों को ‘सॉफ्ट रिलीज़’ प्रक्रिया के तहत सावधानीपूर्वक जंगल में छोड़ा जाता है। अब तक महाराष्ट्र के मेलघाट, पेंच और ताडोबा टाइगर रिज़र्व में 34 गिद्धों को सफलतापूर्वक छोड़ा जा चुका है।

असम में भी BNHS भविष्य में इसी तरह के रिलीज़ कार्यक्रम की तैयारी कर रहा है। गिद्धों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने के उद्देश्य से संस्था स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर केमिस्टों, पशु चिकित्सकों, किसानों, पशुपालकों और स्कूली बच्चों को डाइक्लोफेनाक, एसीक्लोफेनाक, कीटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी हानिकारक दवाओं से बचने के बारे में जागरूक कर रही है।

छात्रों के लिए सत्र का समापन एक सरल लेकिन प्रभावशाली संदेश के साथ हुआ-गिद्धों को बचाना सिर्फ़ वैज्ञानिकों या वन्यजीव विशेषज्ञों की ज़िम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी की साझा ज़िम्मेदारी है, जो जागरूकता, संवेदनशीलता और रोज़मर्रा के सही चुनावों से शुरू होती है।

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