शिक्षा मंत्रालय ने 31 दिसंबर को आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर अमरेन्द्र कुमार दास को असम के तेजपुर विश्वविद्यालय का नया प्रो-वाइस चांसलर नियुक्त किया है। यह नियुक्ति ऐसे समय पर की गई है, जब विश्वविद्यालय के प्रशासन और कार्यप्रणाली को लेकर उठे विवादों की जांच के लिए केंद्र सरकार ने एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन भी किया है।
उच्च शिक्षा विभाग, भारत सरकार द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, आईआईटी गुवाहाटी के डिजाइन विभाग में कार्यरत प्रो. दास की नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी। उनकी सेवा शर्तें तेजपुर विश्वविद्यालय अधिनियम, नियमावली और अध्यादेशों के अनुसार संचालित होंगी। इस नियुक्ति को सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी प्राप्त है।
इसी दिन शिक्षा मंत्रालय ने तेजपुर विश्वविद्यालय अधिनियम, 1993 की धारा 9 के तहत एक तीन सदस्यीय जांच समिति के गठन की भी घोषणा की। यह समिति विश्वविद्यालय में चल रहे संकट, प्रशासनिक अस्थिरता और कुलपति के खिलाफ लगे आरोपों सहित सभी संबंधित मामलों की विस्तृत जांच करेगी।
जांच समिति के अध्यक्ष मणिपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. लोकेन्द्र सिंह होंगे। अन्य सदस्यों में नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जगदीश कुमार पटनायक और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सचिव प्रो. मनीष आर. जोशी शामिल हैं।
कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, तेजपुर विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति को जांच पूरी होने तक तत्काल प्रभाव से सभी प्रशासनिक दायित्वों से अलग रहते हुए अवकाश पर जाने का निर्देश दिया गया है। जांच पूरी होने तक वे अवकाश पर ही रहेंगे।
समिति को पूर्व में चांसलर कार्यालय को सौंपी गई फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट की निष्कर्षों और सिफारिशों की भी समीक्षा करने का जिम्मा सौंपा गया है। इसके अलावा, विश्वविद्यालय में उत्पन्न मौजूदा संकट, विभिन्न पदाधिकारियों के इस्तीफे और कार्यभार ग्रहण करने की परिस्थितियों की भी जांच की जाएगी। समिति को परिसर का दौरा करने, हितधारकों से बातचीत करने और आवश्यक दस्तावेजों की समीक्षा करने का अधिकार दिया गया है।
जांच समिति को अधिकतम तीन माह के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। यूजीसी समिति को सचिवीय सहयोग प्रदान करेगी, जबकि तेजपुर विश्वविद्यालय प्रशासन को पूर्ण सहयोग और सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
इन दोनों फैसलों को तेजपुर विश्वविद्यालय में प्रशासनिक स्थिरता बहाल करने और शासन से जुड़े गंभीर सवालों के समाधान के लिए केंद्र सरकार के सीधे हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
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