असम के कलाकार की शास्त्रीय पांडुलिपियों को राष्ट्रपति भवन पुस्तकालय में मिला स्थान

असम के कलाकार की शास्त्रीय पांडुलिपियों को राष्ट्रपति भवन पुस्तकालय में मिला स्थान

असम की समृद्ध कला और साहित्यिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिष्ठित पहचान मिली है। नगांव स्थित पारंपरिक कलाकार मृदु मौसम बोरा की कृतियों को भारत की नव-उद्घाटित भारतीय शास्त्रीय भाषा पुस्तकालय में स्थान दिया गया है। सदियों पुरानी सांचीपाट पांडुलिपि निर्माण परंपरा और ताइखाम चित्रकला तकनीक पर आधारित बोरा के कार्य भारत की शास्त्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण व प्रस्तुति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल का हिस्सा बने हैं।

असम के नगांव जिले के ढींग क्षेत्र के अथगांव गांव के निवासी मृदु मौसम बोरा को राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में आयोजित भारतीय शास्त्रीय भाषा पुस्तकालय के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति द्वारा विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। यह आमंत्रण असम की विलुप्त होती पांडुलिपि परंपराओं और शास्त्रीय कला रूपों के संरक्षण में उनके योगदान को मिल रही राष्ट्रीय मान्यता को दर्शाता है।

बीते वर्षों में बोरा ने अगर वृक्ष की छाल से तैयार की जाने वाली सांचीपाट पांडुलिपि और उस पर की जाने वाली ताइखाम शैली की चित्रकला को पुनर्जीवित करने और उसमें महारत हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त की है। उनकी सूक्ष्म कारीगरी ने प्राचीन ज्ञान परंपराओं को संरक्षित करने के साथ-साथ असम की शास्त्रीय विरासत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई है।

भारत सरकार की इस पहल के तहत, असमिया पांडुलिपियों पर आधारित चार संकलित पुस्तकें, बोरगीत की सांचीपाट पांडुलिपि, सांचीपाट शीट्स, पारंपरिक स्याही (माही) और प्राकृतिक रंग निर्माण की सामग्री सभी बोरा द्वारा तैयार को पुस्तकालय में देश-विदेश से आने वाले आगंतुकों के लिए स्थायी प्रदर्शन हेतु रखा गया है।

इस राष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थान में मृदु मौसम बोरा के कार्यों को शामिल किया जाना असम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो भारत की शास्त्रीय भाषाओं और कला परंपराओं में राज्य के ऐतिहासिक योगदान को और सुदृढ़ करता है। इस मान्यता के माध्यम से बोरा का कार्य अतीत और वर्तमान के बीच सेतु बनते हुए असम की शास्त्रीय पांडुलिपि संस्कृति को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर स्थायी प्रासंगिकता प्रदान कर रहा है।

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