एक अप्रकाशित किताब संसद तक पहुँच गई और वह भी किसी और के नहीं, बल्कि भारत के पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे (सेवानिवृत्त) की। जनरल नरवणे वही सैन्य अधिकारी हैं, जिन्होंने 1962 के बाद भारत-चीन के सबसे बड़े सैन्य टकराव के दौरान भारतीय सेना का नेतृत्व किया था।
उनकी आत्मकथा Four Stars of Destiny वर्ष 2024 में प्रकाशित होने वाली थी। किताब के लिए बुकस्टोर्स में प्री-ऑर्डर भी शुरू हो चुके थे और ऑनलाइन प्री-बुकिंग हो रही थी। लेकिन अचानक इसका प्रकाशन रोक दिया गया। अब साल 2026 है और यह किताब अब तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है।
इसके बावजूद, पिछले सप्ताह यह किताब न तो किसी ब्लैक मार्केट में दिखी और न ही किसी लीक वेबसाइट पर बल्कि सीधे संसद में, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के हाथों में दिखाई दी। और यह कोई कच्ची पांडुलिपि नहीं थी, बल्कि एक पूरी तरह छपी हुई हार्डकवर किताब थी।
जिस किताब को रक्षा मंत्रालय (MoD) की मंज़ूरी के बिना प्रेस में नहीं जाना चाहिए था, और जिसके बारे में खुद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि “ऐसी कोई किताब अस्तित्व में ही नहीं है”, वह राहुल गांधी तक कैसे पहुँची?
इस सवाल ने आम लोगों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी। हमने प्रकाशन प्रक्रिया को समझने की कोशिश की और अलग-अलग लोगों से बात की। अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं है, लेकिन तथ्यों को जोड़ने पर एक तस्वीर उभरती है।
यह किताब जनरल नरवणे के चार दशकों के सैन्य करियर का लेखा-जोखा है सेकंड लेफ्टिनेंट से लेकर सेना प्रमुख बनने तक की यात्रा, और चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए गंभीर टकराव का प्रत्यक्ष विवरण। इस किताब का प्रकाशक Penguin Random House India है।
संसद के बजट सत्र के बाद, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धन्यवाद प्रस्ताव पेश करने वाले थे, तब लोकसभा में हंगामा खड़ा हो गया। राहुल गांधी ने एक मैगज़ीन लेख का हवाला दिया, जो जनरल नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा पर आधारित था।
राहुल गांधी ने पाँच मिनट से भी कम समय में अपनी बात रखी, लेकिन इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह समेत भाजपा के शीर्ष नेताओं ने उन पर तीखा हमला बोला।
राजनाथ सिंह ने सवाल किया, “क्या वह किताब प्रकाशित हुई है? अगर हुई है तो उसे उद्धृत कीजिए। अगर प्रकाशित नहीं हुई है, तो उसका हवाला देना उचित नहीं है।”
दो दिन बाद राहुल गांधी संसद में Four Stars of Destiny की हार्डकॉपी लेकर पहुँचे और कहा कि वे इसे “प्रधानमंत्री को भेंट करना चाहते हैं।”

जब रक्षा मंत्री को यकीन था कि किताब प्रकाशित नहीं हुई है, तो इसकी छपी हुई प्रति अचानक कैसे सामने आ गई?
रक्षा प्रमुखों की आत्मकथाएँ दुनिया भर में गंभीरता से पढ़ी जाती हैं। भारत में भी कई सेवानिवृत्त जनरल, एयर मार्शल और एडमिरल अपनी किताबें लिख चुके हैं। लेकिन जनरल नरवणे की किताब एक अपवाद बन गई है।
The Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय ने 35 सैन्य किताबों को मंज़ूरी दी, लेकिन Four Stars of Destiny ही एकमात्र ऐसी पांडुलिपि है, जो अब तक लंबित है।
Penguin Random House ने इस किताब को “नेतृत्व, प्रबंधन और 21वीं सदी की चुनौतियों के संदर्भ में सशस्त्र बलों को अधिक सक्षम बनाने” वाली पुस्तक बताया था।
विपक्ष का कहना है कि इस किताब में भारत-चीन संघर्ष और अग्निपथ योजना जैसे संवेदनशील विषयों का ज़िक्र है, जिसने सरकार को असहज कर दिया।
यह स्पष्ट किया गया है कि रक्षा मंत्रालय को आमतौर पर किताब की पांडुलिपि (manuscript) भेजी जाती है, न कि छपी हुई किताब। The Caravan पत्रिका ने भी उसी पांडुलिपि के आधार पर अपना लेख लिखा था।
लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि किताब की छपी हुई प्रतियाँ दिल्ली के कुछ बुकस्टोर्स तक पहुँच भी गई थीं, जिन्हें बाद में वापस मंगवा लिया गया।
एक बुकस्टोर कर्मचारी ने बताया, “हमने सैकड़ों प्री-ऑर्डर लिए थे, लेकिन विवाद के बाद हमें किताबें प्रकाशक को लौटानी पड़ीं।”
कानूनी स्थिति यह है कि सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी सेना अधिनियम के तहत किताब लिखने के लिए बाध्य नहीं होते, लेकिन Official Secrets Act, 1923 आजीवन लागू रहता है। यानी कोई भी गोपनीय या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी उजागर करना अपराध है।
इसी वजह से ज़्यादातर पूर्व अधिकारी एहतियातन रक्षा मंत्रालय से मंज़ूरी लेते हैं।
लेफ्टिनेंट जनरल के.जे.एस. ढिल्लों (सेवानिवृत्त) ने बताया कि सेना मुख्यालय में किताबों की तीन-स्तरीय समीक्षा प्रक्रिया होती है।
जनरल नरवणे खुद भी कह चुके हैं कि उनकी किताब एक साल से अधिक समय से समीक्षा में अटकी हुई है।
क्या प्रकाशक ने रक्षा मंत्रालय की अंतिम मंज़ूरी से पहले ही किताब छाप दी?
या फिर पहले मंज़ूरी मिली और बाद में सरकार ने उससे पीछे हटने का फैसला किया?
सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी को यह किताब लेखक या प्रकाशक के ज़रिए मिली थी, हालांकि इसे सार्वजनिक रूप से दिखाने के लिए नहीं दिया गया था।
असल मुद्दा यह नहीं है कि राहुल गांधी को किताब कैसे मिली, बल्कि यह है कि एक संवेदनशील रक्षा-संबंधी पांडुलिपि बिना औपचारिक मंज़ूरी के किताब का रूप कैसे ले गई।
अब सरकार और प्रकाशक दोनों को यह साफ करना होगा कि यह “अप्रकाशित” किताब संसद तक आखिर पहुँची कैसे।
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