अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूती देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल जाति आधारित आरक्षण पर अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त करना अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपमान या अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
अदालत ने कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद नागरिकों को खुलकर अपनी बात रखने का अधिकार देती है और विचारों की अभिव्यक्ति को तब तक अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक उसमें किसी समुदाय के खिलाफ जानबूझकर अपमान, धमकी या घृणा फैलाने का उद्देश्य न हो।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कानून का इस्तेमाल असहमति या वैचारिक बहस को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग विचारों के लिए जगह होना आवश्यक है और शांतिपूर्ण ढंग से राय रखना नागरिक का मौलिक अधिकार है।
इस फैसले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, वहीं झूठे या प्रेरित मामलों के जरिए कानून के दुरुपयोग पर भी यह एक सख्त संदेश देता है।
- Log in to post comments