रेलवे ‘ज़मीन-के-बदले-नौकरी’ घोटाला एक बहुचर्चित भ्रष्टाचार का मामला है, जिसमें पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के कई सदस्यों पर गंभीर आरोप लगे हैं। मामला इस आरोप पर आधारित है कि 2004 से 2009 तक, जब लालू रेल मंत्री थे, तब रेलवे में नौकरी देने के बदले ज़मीन ली गई, जिससे यादव परिवार ने बेहद कम कीमत पर कई संपत्तियाँ अपने नाम करवाईं।
CBI (केंद्रीय जाँच ब्यूरो) का दावा है कि ग्रुप-D रेलवे नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों ने भर्ती पाने के लिए अपनी ज़मीनें मुख्य रूप से पटना और आसपास के इलाकों में लालू यादव के परिवार, या उनसे जुड़ी कंपनियों को बेच दीं या उपहार (गिफ्ट) में दे दीं। आरोप है कि ये ज़मीनें वास्तविक बाज़ार मूल्य से बहुत कम कीमत पर ट्रांसफर की गईं। CBI यह भी कहती है कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया, और कुछ मामलों में चयनित उम्मीदवार अपने नाम तक ठीक से लिखने में असमर्थ थे। जाँच एजेंसी के अनुसार, यादव परिवार ने सरकारी नौकरियों को सौदेबाज़ी का हथियार बनाकर ज़मीन और अन्य निजी लाभ हासिल किए, जो एक संगठित आपराधिक साज़िश जैसा था।
9 जनवरी 2026 को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने:
लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी (पूर्व बिहार CM), उनके बच्चे तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव, मीसा भारती, और कई करीबी सहयोगियों के खिलाफ आरोप तय (Charges Framed) कर दिए।
अदालत ने उनकी डिस्चार्ज याचिका (आरोप हटाने की अर्जी) खारिज कर दी और कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी (cheating) और आपराधिक साज़िश (criminal conspiracy) का प्रतीत होता है। अदालत ने टिप्पणी की कि आरोपों के अनुसार, रेल मंत्रालय को निजी सत्ता केंद्र की तरह इस्तेमाल किया गया, ताकि यह योजना चलाई जा सके।
इस मामले में कुल 98 आरोपियों में से 46 लोगों पर आरोप तय किए जा रहे हैं।
CBI की जाँच के साथ-साथ, प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस मामले के मनी लॉन्ड्रिंग पहलू की भी जाँच कर रहा है। ED का दावा है कि यादव परिवार ने कथित घोटाले के माध्यम से ₹600 करोड़ से अधिक की संपत्तियाँ अपराध की आय (Proceeds of Crime) के रूप में अर्जित की होंगी।
लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार सभी आरोपों से इनकार करता है और इसे राजनीति से प्रेरित कार्रवाई बताता है। यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन (Under Trial) है, और जाँच तथा कानूनी कार्यवाही जारी है, ताकि कथित घोटाले के पूरे सच का पता लगाया जा सके।
यह घोटाला इस बात को उजागर करता है कि कैसे सरकारी नौकरियों का दुरुपयोग निजी संपत्ति और सत्ता हासिल करने के लिए किया जा सकता है, जिससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि जनता का भरोसा भी कमज़ोर होता है।
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