मद्रास हाईकोर्ट ने 1755 के नाथम कनवाई युद्ध नायकों के स्मारक स्तूप को दी मंज़ूरी

न्यायमूर्ति जी आर स्वामिनाथन का ऐतिहासिक निर्णय

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले में 1755 के नाथम कनवाई युद्ध के वीर नायकों की स्मृति में स्मारक स्तूप के निर्माण की अनुमति दे दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति जी आर स्वामिनाथन ने पारित किया। स्थानीय प्रशासन द्वारा पूर्व में स्मारक निर्माण की अनुमति अस्वीकृत कर दी गई थी, जिसे अब अदालत ने रद्द (quash) कर दिया है।

याचिका शिव कलईमणि अंबलम (Siva Kalaimani Ambalam) की ओर से दायर की गई थी, जो पेशे से एक वकील हैं। उन्होंने नाथम के तहसीलदार द्वारा निजी पट्टा भूमि (patta land) पर स्तूप निर्माण की अनुमति न दिए जाने को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने आदेश देते हुए कहा कि निजी पट्टा भूमि पर युद्ध नायकों को सम्मानित करने के लिए स्मारक बनाने हेतु किसी विशेष सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति स्वामिनाथन ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि जब स्टेन स्वामी जैसे व्यक्तियों के लिए निजी भूमि पर स्मारक बनाने हेतु कोई अनुमति आवश्यक नहीं होती, तो फिर औपनिवेशिक ब्रिटिश ताकतों से लड़ने वाले मूल भारतीय योद्धाओं के सम्मान में स्मारक निर्माण पर भी अनुमति की शर्त लागू नहीं होनी चाहिए।

अदालत ने युद्ध के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए बताया कि 1755 में नाथम कनवाई की पहाड़ियों पर "मेलूर कल्लार समुदाय" (Melur Kallars) ने ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी को पराजित किया था और लूटे गए मंदिर की मूर्तियों (idols) को वापस हासिल किया था। इस संघर्ष में हजारों लोगों के बलिदान की बात भी सामने आती है, जबकि ब्रिटिश पक्ष के केवल कुछ सिपाही ही जीवित बच पाए थे।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे स्मारक ऐतिहासिक गौरव, सामुदायिक सम्मान और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देने के लिए बेहद ज़रूरी हैं, और इन्हें निजी भूमि पर स्थापित करने में कानूनी या प्रशासनिक बाधा नहीं होनी चाहिए।

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