Supreme Court of India ने गुरुवार को केंद्र सरकार और Election Commission of India को नोटिस जारी कर उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के खर्च पर अनिवार्य सीमा तय करने की मांग की गई है।
याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) के स्पष्टीकरण 1(ए) को असंवैधानिक घोषित करने की भी मांग की गई है। यह प्रावधान राजनीतिक दलों को चुनावी खर्च की सीमा से बाहर रखता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई में यह सवाल उठाया कि ऐसे खर्च को नियंत्रित करना कितना संभव है, क्योंकि मित्र और अन्य व्यक्ति भी चुनावी खर्च में योगदान दे सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता Prashant Bhushan ने दलील दी कि 2024 के इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में संविधान पीठ ने अनियंत्रित राजनीतिक दलों के खर्च के “बहिष्करणकारी और विकृत प्रभाव” पर टिप्पणी की थी, जो चुनावी परिणाम, लोकतांत्रिक भागीदारी और समान अवसर को प्रभावित करता है।
पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को तय की है।
याचिका में कहा गया है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 77(1) और चुनाव आचरण नियम, 1961 के नियम 90 के तहत व्यक्तिगत उम्मीदवारों के चुनाव खर्च पर सख्त सीमा निर्धारित है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर ऐसी कोई सीमा नहीं है।
साथ ही, धारा 77(1) के स्पष्टीकरण 1(ए) के तहत नेताओं और स्टार प्रचारकों द्वारा किए गए खर्च को उम्मीदवार के खर्च में शामिल नहीं किया जाता। इससे राजनीतिक दलों को चुनाव के दौरान असीमित धन खर्च करने की छूट मिल जाती है, जिससे उम्मीदवारों पर निर्धारित खर्च सीमा अप्रभावी हो जाती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि अनियंत्रित पार्टी खर्च ने भारतीय चुनावों में “राष्ट्रपति शैली” की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है, जहां भारी धनराशि खर्च कर एक ही नेता के इर्द-गिर्द प्रचार केंद्रित किया जाता है, जो संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि दुनिया के कई संवैधानिक लोकतंत्रों में राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च का नियमन संभव और आवश्यक माना गया है।
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