ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई अहम मांगें रखने जा रही है। ये मांगें चुनाव आयोग (ECI) द्वारा राज्य में की जा रही विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया से जुड़ी हैं। आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से पहले यह मुद्दा तृणमूल कांग्रेस सरकार और केंद्र के बीच टकराव का कारण बन गया है।
सूत्रों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि SIR प्रक्रिया से बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटने का खतरा है और इसमें पारदर्शिता की कमी है। पार्टी का कहना है कि चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को अनुचित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल हैं, इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिका भी शामिल है। राज्य सरकार की रणनीति का केंद्र SIR प्रक्रिया के तरीके में व्यापक बदलाव की मांग है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने चुनाव आयोग से आधिकारिक संचार में WhatsApp के उपयोग को पूरी तरह बंद करने की मांग की है। सरकार का कहना है कि सभी निर्देश आधिकारिक लेटरहेड पर, उचित मेमो नंबर और तारीख के साथ जारी किए जाएं और उन्हें ECI की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
ममता बनर्जी पहले भी तथाकथित “WhatsApp Commission” की आलोचना कर चुकी हैं और अनौपचारिक डिजिटल निर्देशों की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठाती रही हैं।
एक अन्य प्रमुख मांग माइक्रो ऑब्जर्वर्स की भूमिका से जुड़ी है। राज्य सरकार ने SIR प्रक्रिया से माइक्रो ऑब्जर्वर्स को पूरी तरह हटाने की मांग की है और उनके स्थान पर सरकार द्वारा चिन्हित 8,505 ग्रुप-बी अधिकारियों के पैनल को शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इन अधिकारियों की जिला-वार सूची पहले ही चुनाव आयोग को सौंपी जा चुकी है।
तृणमूल सरकार ने यह भी मांग की है कि माइक्रो ऑब्जर्वर्स द्वारा लिए गए निर्णयों को रद्द किया जाए, खासकर उन मामलों में जहां मतभेद हो। सरकार का कहना है कि अंतिम निर्णय का अधिकार केवल निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) या सहायक ERO के पास होना चाहिए। वैकल्पिक रूप से, माइक्रो ऑब्जर्वर्स की आपत्तियों को इन्हीं वैधानिक अधिकारियों के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजा जाए।
राज्य सरकार ने अदालत से यह भी सुनिश्चित करने का आग्रह किया है कि केवल नाम में मामूली अंतर के आधार पर किसी भी मतदाता का नाम मतदाता सूची से न हटाया जाए। सरकार का आरोप है कि छोटी-छोटी त्रुटियों के आधार पर नोटिस जारी कर मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल ने उन सभी मामलों को तुरंत स्वीकार करने की मांग की है, जिन्हें पहले स्थायी निवास प्रमाण पत्र जमा करने के कारण खारिज कर दिया गया था। सरकार का कहना है कि अब चुनाव आयोग ने इन दस्तावेजों को मान्य कर लिया है।
सरकार ने यह भी अनुरोध किया है कि आवास आवंटन स्वीकृति पत्रों को प्राथमिक दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाए, यह बताते हुए कि बिहार में इसी तरह की प्रक्रिया के दौरान ऐसे दस्तावेज मान्य किए गए थे।
ममता बनर्जी ने SIR की गति और दायरे पर सवाल उठाते हुए कहा है कि दशकों बाद होने वाली इस प्रक्रिया को कुछ ही महीनों में जल्दबाजी में क्यों पूरा किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि 2022 की मतदाता सूची में दर्ज मतदाताओं को भी निशाना बनाया जा रहा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही निर्देश दे चुका है कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और नागरिकों को असुविधा न हो।
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन दायर किया गया है, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की व्यक्तिगत उपस्थिति को “संवैधानिक रूप से अनुचित” और “कानूनी रूप से अस्थिर” बताया गया है। यह आवेदन अखिल भारत हिंदू महासभा के पूर्व उपाध्यक्ष सतीश कुमार अग्रवाल ने दायर किया है, जो SIR को चुनौती देने वाली बनर्जी की याचिका में हस्तक्षेप करना चाहते हैं।
आवेदन में कहा गया है कि यह मामला व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राज्य शासन और चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। इसलिए, जब राज्य पहले से ही अपने वकीलों द्वारा प्रतिनिधित्व कर रहा है, तब एक मौजूदा मुख्यमंत्री का व्यक्तिगत रूप से पेश होना न्यायिक परंपराओं के खिलाफ है।
गौरतलब है कि 4 फरवरी को ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट में दलील देने वाली पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बनी थीं। उन्होंने अदालत से “लोकतंत्र बचाने” के लिए हस्तक्षेप की मांग की थी और आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी कर 9 फरवरी तक जवाब मांगा है।
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