अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे ने भारी नाराज़गी पैदा कर दी है कि 20 साल तक चले अफगानिस्तान युद्ध के दौरान नाटो देशों के सैनिक फ्रंट लाइन से दूर रहे। इस बयान से यूरोपीय सैन्य दिग्गजों और शहीद सैनिकों के परिजन आक्रोशित हैं। सवाल उठता है क्या वाकई नाटो ने अफगान युद्ध के मोर्चे से दूरी बनाई थी? तथ्यों और आंकड़ों की रोशनी में जानिए सच्चाई।
“मेरा बेटा सिर्फ 18 साल का था, जब वह अपने साथियों को बचाने की कोशिश करते हुए एक विस्फोट में मारा गया,” अफगानिस्तान में मारे गए सबसे कम उम्र के ब्रिटिश सैनिक की मां ने कहा। वह उन सैकड़ों यूरोपीय सैन्य दिग्गजों और शहीदों के परिजनों में शामिल हैं, जिन्होंने ट्रंप के बयान के खिलाफ आवाज उठाई है।
असलियत यह है कि अफगानिस्तान में सेवा करते हुए सिर्फ अमेरिकी सैनिक ही नहीं, बल्कि नाटो के कई सहयोगी देशों के सैनिक भी अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे।
- अफगानिस्तान युद्ध में नाटो की भूमिका
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों ने 2001 में अफगानिस्तान पर हमला किया। इस दौरान नाटो संधि के अनुच्छेद 5 को लागू किया गया, जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला, सभी पर हमला माना जाता है।
2014 तक, जब औपचारिक लड़ाकू अभियान समाप्त हुए, और उसके बाद भी, नाटो देशों ने अमेरिकी सैनिकों के साथ मिलकर अफगानिस्तान में लड़ाई लड़ी। इस युद्ध की कीमत नाटो देशों को जान और धन — दोनों रूपों में चुकानी पड़ी।
इसी वजह से ट्रंप की टिप्पणी ने न केवल नाटो सहयोगियों को, बल्कि यूरोपीय सैन्य दिग्गजों को भी नाराज़ कर दिया। हालात तब और बिगड़े जब यह बयान ऐसे समय आया, जब ट्रंप डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को कब्जे में लेने की धमकी दे रहे थे।
ट्रंप ने कहा, “हमें उनकी कभी ज़रूरत नहीं पड़ी। हमने उनसे कभी सच में कुछ नहीं मांगा। वे कहेंगे कि उन्होंने अफगानिस्तान में कुछ सैनिक भेजे… और उन्होंने भेजे, लेकिन वे थोड़ा पीछे रहे, फ्रंट लाइन से दूर।”
इस बयान के बाद नाटो सहयोगी देशों में गुस्सा और निंदा की लहर दौड़ गई।
- आंकड़े क्या कहते हैं?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2001 में करीब 38 नाटो देशों ने अफगानिस्तान युद्ध में भाग लिया। हालांकि, सबसे बड़ा सैन्य दल हमेशा अमेरिका का ही रहा।
2011 में अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों की संख्या चरम पर थी लगभग 1,40,000 सैनिक, जो बाद में धीरे-धीरे घटती गई।
संख्या के लिहाज से अमेरिका को सबसे अधिक नुकसान हुआ, लेकिन जनसंख्या के अनुपात में देखें तो कई यूरोपीय देशों को लगभग उतना ही नुकसान झेलना पड़ा।
20 साल चले इस युद्ध में, जिसका उद्देश्य अल-कायदा को खत्म करना और तालिबान को सत्ता से हटाना था, करीब 3,500 सैनिकों की मौत हुई।
- अमेरिका: 2,456 सैनिक
- ब्रिटेन: 457 सैनिक
डेनमार्क, जिसकी आबादी अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य से भी कम है, ने करीब 50 सैनिक खोए। प्रति व्यक्ति मौतों के अनुपात में देखें तो यह अमेरिका के बराबर है।
इसके अलावा:
- कनाडा: 159
- फ्रांस: 90
- जर्मनी: 62
- इटली: 53
- पोलैंड: 44
एस्टोनिया, नॉर्वे, नीदरलैंड्स, चेक गणराज्य और रोमानिया जैसे अन्य नाटो देशों ने भी दर्जनों सैनिक खोए।
- फ्रंट लाइन पर कौन लड़ा?
अफगान सरकार ने आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए, लेकिन पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी ने 2019 में कहा था कि 2014 के बाद से 45,000 से ज्यादा अफगान सैनिक मारे गए।
ट्रंप का यह दावा भी गलत साबित होता है कि नाटो सैनिक फ्रंट लाइन पर नहीं थे। नाटो की वेबसाइट के अनुसार, 36 सदस्य देशों के सैनिक काबुल, मजार-ए-शरीफ, हेरात, कंधार और लगमान जैसे इलाकों में तैनात थे ये सभी क्षेत्र भीषण लड़ाई के गवाह रहे।
बीबीसी के रक्षा विशेषज्ञ फ्रैंक गार्डनर के अनुसार, ब्रिटिश, कनाडाई, डेनिश और एस्टोनियाई सैनिकों को कंधार और हेलमंद जैसे सबसे खतरनाक इलाकों में लड़ाई का सामना करना पड़ा।
हेलमंद प्रांत जो तालिबान का गढ़ और अफीम उत्पादन का केंद्र रहा है वहां शुरू में ज़्यादातर ब्रिटिश और डेनिश सैनिक तैनात थे। अमेरिका ने 2008 में वहां अतिरिक्त सैनिक भेजे, CNN की रिपोर्ट के अनुसार।
ब्रिटेन और डेनमार्क को इसी दक्षिणी प्रांत में सबसे अधिक जानमाल का नुकसान हुआ।
वॉटसन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स के एक शोध पत्र के अनुसार, ब्रिटिश और कनाडाई सैनिकों ने अमेरिकी सैनिकों की तुलना में दोगुने जोखिम में अपनी जान गंवाई, जब इसे प्रत्येक देश की अधिकतम तैनाती के प्रतिशत के हिसाब से देखा गया।
इसलिए, अफगानिस्तान युद्ध में नाटो सहयोगियों की भूमिका को कमतर आंकने की ट्रंप की कोशिश तथ्यों के सामने टिक नहीं पाती।
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