सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर जारी तीखी बहस के बीच मिजोरम के मुख्यमंत्री Lalduhoma ने मिजो विवाह और उत्तराधिकार कानून में किए गए हालिया संशोधनों का बचाव किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संशोधन सरकार का एकतरफा फैसला नहीं था, बल्कि विभिन्न हितधारकों से व्यापक परामर्श के बाद लाया गया है।
Mizo Marriage and Inheritance of Property (Amendment) Bill को इस महीने की शुरुआत में मिजोरम विधानसभा ने पारित किया। कानून मंत्री के रूप में लालदुहोमा द्वारा पेश किए गए इस विधेयक में 2014 के मूल अधिनियम को और मजबूत करते हुए बहुविवाह, अंतर-समुदाय विवाह और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों से संबंधित प्रावधान जोड़े गए हैं।
संशोधन में बहुविवाह पर औपचारिक प्रतिबंध लगाया गया है और महिलाओं को वैवाहिक संपत्ति में 50 प्रतिशत तक हिस्सेदारी का अधिकार दिया गया है। हालांकि, यह विवाद तब बढ़ गया जब कुछ लोगों ने आशंका जताई कि गैर-मिजो पुरुष से विवाह करने पर मिजो महिलाओं की मिजो पहचान और अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्रभावित हो सकता है।
इस मुद्दे पर नागरिक संगठनों, विशेषकर Mizo Hmeichhe Insuihkhawm Pawl (MHIP) ने कड़ी आपत्ति जताई है और राज्य सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग की है, यह कहते हुए कि यह मिजो महिलाओं के लिए असुरक्षित हो सकता है।
विधानसभा में एक निजी सदस्य प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लालदुहोमा ने कहा कि विधेयक मिजो कस्टमरी लॉ रिव्यू कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है। इस समिति में MHIP, Central Young Mizo Association (CYMA), Mizoram University और राज्य के विधि महाविद्यालय सहित 10 संगठनों के प्रतिनिधि और विशेषज्ञ शामिल हैं।
मुख्यमंत्री ने बताया कि 2014 के मिजो विवाह, तलाक और संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम में यह प्रावधान था कि यदि कोई मिजो महिला समुदाय के बाहर विवाह करती है तो उसे पति के परिवार का हिस्सा माना जाएगा और वह मिजो पारंपरिक अधिकारों से अलग हो जाएगी। उन्होंने कहा कि परंपरागत कानून इस स्थिति को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं करता और बच्चों की स्थिति को लेकर भी अस्पष्ट है।
उन्होंने मई 1977 में गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक परिपत्र का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि अंतर-जातीय या अंतर-जनजातीय विवाह से जन्मे बच्चों को, यदि वे जनजातीय रीति-रिवाजों के अनुसार पले-बढ़े हों और समुदाय द्वारा स्वीकार किए गए हों, तो जनजातीय प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। साथ ही उन्होंने अक्टूबर 2019 में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा जारी समान परिपत्र का भी हवाला दिया।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले वर्ष नवंबर में आया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला केवल संबंधित याचिकाकर्ता तक सीमित था और इसे सभी अनुसूचित जाति या जनजाति पर लागू सामान्य निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
लालदुहोमा ने कहा कि आज के “वैश्विक गांव” के दौर में अंतर-समुदाय विवाह अपरिहार्य हैं और समाज को संकीर्ण सोच से बाहर निकलना होगा। उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से कई मिजो महिलाओं को जानते हैं, जिन्होंने गैर-मिजो पुरुषों से विवाह किया है और भारत तथा विदेशों में रहते हुए भी मिजो समाज में सक्रिय योगदान दे रही हैं।
मामले की संवेदनशीलता को स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि इस मुद्दे पर गहन अध्ययन के लिए एक अलग समिति गठित की जा सकती है, ताकि समुदाय से बाहर विवाह करने वाली मिजो महिलाओं और उनके बच्चों की कानूनी व सामाजिक स्थिति पर विस्तार से विचार किया जा सके। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार संवाद और समीक्षा के लिए तैयार है।
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