असम में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण खोज करते हुए भूजल में रहने वाली मछली की नई प्रजाति ‘Gitchak nakana’ की पहचान की है। यह पूर्वोत्तर भारत से दर्ज की गई पहली एक्विफर-निवासी (फ्रेटोबिटिक) मछली है। यह खोज राज्य में भूजल पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

इस खोज से संबंधित अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित हुआ है। शोध का नेतृत्व Ralf Britz (सेन्केनबर्ग नेचुरहिस्टोरिशे सम्लुंगेन ड्रेसडेन) ने किया। इस शोध में Assam Don Bosco University के वैज्ञानिक Wimarithy K. Marak सहित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के शोधकर्ताओं ने सहयोग किया।

नई प्रजाति ‘Gitchak nakana’ एक छोटी, नेत्रहीन और रंगहीन कोबिटिड लोच (Cobitid loach) मछली है, जिसमें भूमिगत जीवन के अनुरूप विशेष लक्षण (ट्रोग्लोमॉर्फिक विशेषताएं) पाए जाते हैं। इनमें आंखों का पूर्ण अभाव और शरीर में रंजकता का न होना शामिल है। यह प्रजाति पश्चिमी असम में ब्रह्मपुत्र घाटी के निकट Shillong Plateau की तलहटी में स्थित एक गांव के कुएं से तीन अलग-अलग अवसरों पर एकत्र की गई।

इस मछली की सबसे अनोखी शारीरिक विशेषता इसकी खोपड़ी की छत का पूर्ण अभाव है। इसके मस्तिष्क के ऊपरी हिस्से को केवल त्वचा ढकती है, जो अन्य ज्ञात कोबिटिड वंशों में नहीं पाई जाती। इन्हीं विशिष्ट संरचनात्मक विशेषताओं के कारण इसे एक नई वंश (genus) और नई प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

दुनियाभर में 300 से अधिक मछली प्रजातियां भूमिगत आवासों से जानी जाती हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश गुफाओं में पाई जाती हैं। 10 प्रतिशत से भी कम प्रजातियां भूजल एक्विफर में निवास करती हैं, जिससे ऐसी खोजें अत्यंत दुर्लभ मानी जाती हैं। शिलांग पठार पहले से ही गुफा-निवासी मछलियों के लिए जाना जाता है, लेकिन ‘Gitchak nakana’ इस क्षेत्र से दर्ज की गई पहली एक्विफर-निवासी और पूर्वोत्तर भारत की पहली भूमिगत कोबिटिड मछली है।

यह खोज न केवल क्षेत्र की भूमिगत जैव विविधता के वैज्ञानिक ज्ञान का विस्तार करती है, बल्कि एशिया के इस हिस्से में अब तक अज्ञात भूमिगत जीव-जंतुओं की संभावनाओं की ओर भी संकेत देती है। शोधकर्ताओं ने इस प्रजाति की असामान्य कंकाल संरचना पर भी प्रकाश डाला है और इसके विकासवादी स्थान को लेकर परिकल्पनाएं प्रस्तुत की हैं।
अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि भूजल आवास पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और पूर्वोत्तर भारत में इन नाजुक भूमिगत पारिस्थितिक तंत्रों की खोज और संरक्षण की दिशा में और प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
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