दिल्ली हाईकोर्ट ने 6 जनवरी 2025 को एक वैवाहिक कलह से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह उसकी शारीरिक गरिमा और स्वायत्तता का उल्लंघन होगा और गंभीर मानसिक आघात का कारण बन सकता है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि गर्भपात के लिए महिला को IPC की धारा 312 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब गर्भावस्था को 14 सप्ताह के भीतर मेडिकल प्रक्रिया के माध्यम से समाप्त किया गया हो। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि Medical Termination of Pregnancy (MTP) Act के तहत गर्भपात के लिए पति की सहमति अनिवार्य नहीं है। इस कानून का उद्देश्य महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
मामले में पत्नी ने सेशन कोर्ट के समन आदेश को चुनौती दी थी, यह तर्क देते हुए कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसे प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार है, जिसमें निजता, शारीरिक अखंडता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता शामिल हैं।
वहीं, पति ने दावा किया कि गर्भपात के समय दोनों साथ रह रहे थे और कोई वैवाहिक विवाद मौजूद नहीं था, इसलिए MTP कानून लागू नहीं होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि वैवाहिक कलह को केवल अलगाव के बाद की स्थिति तक सीमित नहीं किया जा सकता, और इसे संकीर्ण परिभाषा में बांधना गलत होगा। अंततः कोर्ट ने पत्नी को पति द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मामले से बरी कर दिया।
यह फैसला महिला अधिकारों और प्रजनन स्वतंत्रता के संदर्भ में एक अहम न्यायिक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
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