आज की दुनिया ऑप्टिमाइज़ेशन, लाइफ हैक्स और दिखावटी खुशहाली के पीछे भाग रही है। एक “अच्छी ज़िंदगी” को ऐसे बेचा जा रहा है जैसे वह कोई मंज़िल हो, जिसे बस हासिल कर लेना है। लेकिन करीब दो हज़ार साल पहले यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने अपनी किताब Nicomachean Ethics में ठीक इसी सोच के ख़तरों की ओर इशारा कर दिया था। उनकी बातें आज के इंस्टाग्राम-परफेक्ट जीवन की आलोचना जैसी लगती हैं।
Aristotle ने सवाल उठाया था अच्छी ज़िंदगी क्या होती है? न सिर्फ़ सुखद, न ही दिखने में सफल, बल्कि सच में अच्छी। उनका जवाब था यूडैमोनिया, जिसे अक्सर गलत तरीके से “खुशी” कह दिया जाता है। यूडैमोनिया का मतलब आनंद के पीछे भागना नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवन को जीना है जिसमें इंसान अपनी बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षमताओं को पूरी तरह विकसित करे। यह कोई वस्तु नहीं जिसे खरीदा जाए, बल्कि एक अभ्यास है जिसे पूरी ज़िंदगी करना पड़ता है।
आधुनिक जीवन यहीं चूक करता है। हमने खुशी को एक प्रोडक्ट बना दिया है जिसे खरीदा जा सकता है, हैक किया जा सकता है, या दस आसान तरीकों में हासिल किया जा सकता है। Aristotle के अनुसार यह बेतुकी सोच है। उनके लिए सद्गुण का मतलब था सही समय पर, सही मात्रा में, सही काम करना। इसे उन्होंने Golden Mean कहा, अति और कमी के बीच संतुलन। जैसे साहस, लापरवाही और कायरता के बीच का रास्ता है।

आज की संस्कृति संतुलन नहीं, बल्कि अतियों को बढ़ावा देती है। सोशल मीडिया एल्गोरिद्म चरम व्यवहार को इनाम देते हैं, क्योंकि वही ज़्यादा ध्यान खींचता है। नतीजा यह कि हम या तो हर पल प्रोडक्टिव बनने की कोशिश करते हैं, या फिर पूरी तरह सुस्ती में डूब जाते हैं। बीच का रास्ता कहीं खो गया है।
Aristotle ने व्यावहारिक बुद्धि (phronesis) की भी बात की थी, हर परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता। यह किताबों या ऑनलाइन कोर्स से नहीं आती, बल्कि अनुभव, गलती और सीख से बनती है। आज हमने इस बुद्धि की जगह जीवन को एक्सेल शीट की तरह मैनेज करना शुरू कर दिया है।
उन्होंने akrasia यानी इच्छाशक्ति की कमजोरी की भी चर्चा की थी जब हमें पता होता है कि क्या सही है, फिर भी हम गलत करते हैं। आज का इंटरनेट इसी कमजोरी का फायदा उठाता है। अरस्तू का समाधान था ऐसे माहौल बनाना जो सही काम को आसान और गलत को कठिन बनाए।

उनके अनुसार, जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य केवल नैतिकता नहीं, बल्कि theoria यानी चिंतन और मनन है। सोचने, समझने और विचारों में डूबने का समय। लेकिन आज हमारे पास सोचने की फुर्सत नहीं। खाली समय स्क्रॉलिंग, नोटिफिकेशन और जवाब देने में चला जाता है। गहरी सोच को हमने वीडियो, रील्स और एआई टूल्स पर छोड़ दिया है।
Aristotle मानते थे कि अच्छे जीवन के लिए अच्छा समाज ज़रूरी है। इंसान अकेले फल-फूल नहीं सकता। आज का इंटरनेट हमें समुदाय देने का वादा करता था, लेकिन उसने हमें और ज़्यादा अकेला और आत्मकेंद्रित बना दिया है। “खुद पर काम करो, गायब हो जाओ” जैसी सोच हमें समाज से काट देती है, जबकि सच्ची उन्नति समुदाय के भीतर ही संभव है।
एक अच्छी ज़िंदगी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक परियोजना है। हमें ऐसे समाज और समुदाय बनाने होंगे ऑनलाइन और ऑफलाइन जो संतुलन, सद्गुण, गहरी दोस्ती और चिंतन को बढ़ावा दें। वरना हम खुद को लगातार सुधारते-सुधारते थक जाएंगे, और हमारे चारों ओर की दुनिया बिखरती चली जाएगी।
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