असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि उनमें रेजाउल करीम सरकर के खिलाफ कार्रवाई करने का साहस नहीं था, जिन्होंने हाल ही में पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
रेजाउल करीम सरकर के अचानक पार्टी छोड़ने पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने कहा,
“रेजाउल करीम सरकर का इस्तीफा गौण विषय है। असली मुद्दा यह है कि एपीसीसी अध्यक्ष गौरव गोगोई को शुरुआत में ही उन्हें पार्टी से निष्कासित कर देना चाहिए था। अब वह इस्तीफा देकर खुद को शहीद घोषित कर गांव लौट गए हैं और खुद को बड़ा हीरो बता रहे हैं। पहले उन्होंने सार्वजनिक रूप से शिवसागर को धुबरी बनाने की बात कही थी। कांग्रेस सांसद होने के नाते गौरव गोगोई को उन्हें पार्टी से निकाल देना चाहिए था, लेकिन वह ऐसा करने में विफल रहे। हम चाहते थे कि उन्हें निष्कासित किया जाए, लेकिन गौरव गोगोई में इतना साहस नहीं था।”
हिमंत बिस्वा सरमा की यह टिप्पणी असम कांग्रेस में पार्टी अनुशासन को लेकर जारी चिंताओं को रेखांकित करती है, खासकर नेताओं के विवादित बयानों और गतिविधियों को लेकर। रेजाउल करीम सरकर का पार्टी में अल्पकालिक कार्यकाल राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, जिससे एपीसीसी नेतृत्व द्वारा असहमति की आवाज़ों से निपटने के तरीके पर सवाल खड़े हो गए हैं।
गौरतलब है कि 14 जनवरी 2026 को कांग्रेस में शामिल होने के महज 60 घंटे बाद ही रेजाउल करीम सरकर ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
गौरव गोगोई को भेजे अपने इस्तीफा पत्र में सरकर ने वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ “गंभीर वैचारिक और नैतिक मतभेदों” का हवाला दिया। उन्होंने विशेष रूप से देबब्रत साइकिया और नागांव से सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का नाम लेते हुए उन्हें “बीजेपी एजेंट” बताया, जो पार्टी को अंदर से कमजोर कर रहे हैं। सरकर ने कहा कि इन नेताओं के आचरण ने उनका मनोबल तोड़ा, उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाया और पार्टी में बने रहना उनके लिए असंभव हो गया।
कांग्रेस में रेजाउल करीम सरकर का यह संक्षिप्त कार्यकाल कई चूकों की ओर इशारा करता है—पार्टी में शामिल कराने से पहले समुचित जांच का अभाव, सार्वजनिक बयानबाज़ी को लेकर उचित मार्गदर्शन की कमी और संवेदनशील सामाजिक-राजनीतिक माहौल में बयानों को संभालने के लिए आंतरिक समन्वय का अभाव। सरकर के बयान, पार्टी की देर से प्रतिक्रिया और आंतरिक मतभेदों ने मिलकर ऐसी स्थिति बना दी, जिसने उन्हें तेजी से पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया और चुनाव से पहले अल्पसंख्यक युवा नेताओं को जोड़ने की कांग्रेस की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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